सोमवार, 14 सितंबर 2009
हिन्दी दिवस पर हमारे मित्र मनीष के शब्द
यह एक सुनियोजित शैक्षिक और भाषाई राजनीति है ताकि एक खास वर्ग, समुदाय, पीढ़ी की उन्नति हो और निम्नमध्य वर्गीय समुदाय उस खास वर्ग द्वारा फैलाई शैक्षिक, राजनैतिक, आर्थिक,औद्योगिक, तकनीकी विसातों पर मोहरा बन सकें और अपने जीवन को धन्य-धन्य हो सकें ।
इसकी सबसे बड़ी मिसाल तो यही है कि आज भी हमारे यहां लगभग सारी अच्छी किताबें english में ही उपलब्ध हैं जबकि होना ये चाहिए था कि सारे भारतीय भाषाओं का भी हिन्दी- अनुवाद करना चाहिए था ताकि एक परिनिष्ढित हिन्दी का विकास पुरे भारत में होता ....शेष फिर कभी
गुरुवार, 13 अगस्त 2009
अक्षर-राग
केदारनाथ सिंह जी का आभार मानते हुए प्रस्तुत है उनकी कविता-
’अक्षर-राग’
यह जो मेरी लिपि है देवनागरी
उसे कभी-कभी अपने नाम पर
शक होता है
शक होता है इसे भाषाविदों की
बहुत-सी बातों पर...........
और यद्यपि
यह भूल चुकी है अपना सारा अतीत
यहॉं तक कि इसे अपना घर
गॉंव
टोला-टपरा
कुछ भी याद नहीं
पर लिखते समय
इसके शब्दों के पीछे मैंने अक्सर देखा है
एक लहूलुहान-सा निरक्षर हाथ
जो संभाले रहता है
इसके हर अक्षर को
कभी अंधेरे में
झॉंककर तो देखो मेरी इस सीधी- सादी लिपि के
अक्षरों के भीतर
तुम्हें वहॉ दिखाई पड़ेगा
किसी धुंआ भरी ढिबरी का
धीमा-धीमा उजास
और हो सकता है किसी खड़ी पाई के नीचे
कहीं सटा हुआ दिख जाए
किसी लिखते-लिखते थक गये हाथ के-
नाखूनों की कोरों तक छलक आया खून भी
मेरा अनुमान है
'क' कुल्हाड़ी से पहले
नहीं आया था दुनिया में
और 'ट' या 'ठ' तो इतने दमदार हैं
कि जैसे फूट पड़े हों सीधे
किसी पत्थर को फोड़कर
हां - हमारे स्पर्श में यह जो 'श' है
लगता है जैसे छिटक पड़ा हो
किसी चुंबन के ताप से
अगर ध्यान से देखो
तो लिपियों में बंद है
आदमी के हाथ का सारा इतिहास
मुझे हर अक्षर
किसी हाथ की बेचैनी का
आईना लगता है
मैं जब भी देखता हूं कोई अपरिचित लिपि
मेरा हाथ छटपटाने लगता है
उससे मिलने के लिये
और चीनी चित्रलिपि तो
धरती के गुरूत्व की तरह खींचती है
मेरी उंगलियों को
और मैं अपने सारे अज्ञान के साथ
घुसना चाहता हूॅं
उसके हर चित्र की बनावट के भीतर
जेसै घुसा होगा खान में
पृथ्वी का सबसे पहला आदमी
और अब यह कैसे बताऊँ
पर छिपाऊँ भी तो क्यों
कि मैं जो चला था बरसों पहलें
एक छाटे- से 'क' की ऊँगली पकड़कर
आज तक एक स्लेट में
चक्कर लगा रहा हूं
'ख' तक पहुंचने के लिए।
गुरुवार, 23 जुलाई 2009
जनसंचार माध्यमों में हिन्दी का स्वरूप
जनसंचार माध्यमों में हिन्दी का स्वरूप
(विज्ञापनों के विशेष संदर्भ में)
एम.फिल. में प्रस्तुत किए गए शोध-प्रबंध का सारलेख
हिन्दी का रूप पत्रकारिता में शुरू से बदलता रहा है। खड़ी बोली से शुरू हुई हिन्दी हिन्दुस्तानी से लेकर हिंग्लिश तक परिवर्तित हुई है जो आगे पता नहीं किस रूप में आ जाए। इससे लगता है कि हर ज़माने की अपनी एक फैशनेबल भाषा रही है जिसमें नए शब्द जुड़ते रहे हैं और संरचना भी बदलती रही है।वास्तव में भाषा का विकास उसके नई संरचनाओं से ही संभव है। इसलिए हर युग में भाषा के रूढ़िपरक और अप्रचलित रूप को त्याग दिया जाता है। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं की भाषा के विकास और उसमें गतिशीलता लाने के लिए भाषा की प्रकृति को बिगाड़ दिया जाए या दूसरी भाषा के रूपों को व्यवहार में लाया जाए। भाषा के विकास के लिए प्रयोगशीलता जरूरी है। लेकिन यह संदर्भ से हटकर नहीं हो इसका भी ध्यान रखना चाहिए। इस प्रयोगशीलता को कौन बनेगा करोड़पति- 1 से 3 तक में अच्छी तरह समझा जा सकता है। देखा जाए तो जनसंचार माध्यमों की यह भाषा, भाषा के शास्त्र और लोकभाषा के बीच का द्वन्द्व है।आज जनसंचार के हर माध्यामों द्वारा प्रयुक्त हिन्दी की संरचना बदलने के पीछे ज्यादातर विद्वानों का मानना है कि यह बदलाव भूमण्डलीकरण और व्यवसायिकता के चलते हो रहा है, क्योंकि हिन्दी एक विशाल क्षेत्र की भाषा है। इतनी विशाल कि जिसमें यूरोप का कोई एक देश समा सकता है। भूमण्डलीकरण/व्यवसायिकता के दौर में विदेशी बाजार इस क्षेत्र के साथ पूरे भारत में छा जाने की कोशिश में रहते हैं और इसके लिए इसका सबसे आसान माध्य्म जनसंचार द्वारा प्रस्तुत विज्ञापन ही हो सकते हैं। इसलिए वे अपने उत्पादों का विज्ञापन हिन्दी में करवा कर लाभ कमाना चाहते हैं। साथ ही उत्पाद को अंतरराष्ट्रीय बताने के लिए हिन्दी में प्रयोग कर मिश्रित भाषा बना देते हैं ताकि उपभोक्ता आकर्षित हों। इस तरह के प्रयोग से हिन्दी की संरचना तो बदलती ही है, वाक्यों में भी व्याकरणिक त्रुटियाँ आ जाती हैं। इतना होने के बाद भी विज्ञापनों की भाषा लोकप्रिय बनी है जिसे हम नकार नहीं सकते, जैसे- ये दिल माँगे more, पप्पू pass हो गया आदि। इसी लोकप्रियता को अन्य माध्यमों मे अपने-अपने तरीके से भुनाया, जैसे- फिल्मों के गाने, न्यूज़ चैनलों की भाषा, टी.वी. सीरियलों के डायलॉग। इसे समाज ने अपनाया भी है।जनसंचार के विभिन्न माध्यमों द्वारा प्रयुक्त हिन्दी को लेकर आज के जाने-माने पत्रकार ‘प्रभाष जोशी’ कह्ते हैं(साक्षात्कार,बहुवचन अंक-17)- “बिना व्याकरण के कोई भाषा नहीं होती लेकिन व्याकरण कहीं बाहर से नहीं, उसी भाषा का होता है।” पाणिनी ने व्याकरण को बताते हुए लिखा है कि लोग जो बोलते हैं, वही अंतिम कसौटी होती है। इसलिए लिखित भाषा में तो व्याकरण रहेगा, लेकिन बोली में जो भाषा का संस्कार होता है, वह अलग-अलग सवालों पर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग व्यक्तियों पर निर्भर करता है। व्याकरण कोई थोपने की चीज़ नहीं है, क्योंकि भाषा की अंतिम ताकत उसकी रवानगी होती है। तो भाषा किसी व्याकरण से बंधी कैसे रह सकती है?संचार माध्यमों की हिन्दी (खासकर विज्ञापन की हिन्दी) भी आज व्याकरण से बंधी नहीं रह गई है। इसलिए आज इसके विविध रूप दिखते हैं, जिसमें दूसरी भाषाओं का समावेश होता नज़र आ रहा है। लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि हिन्दी का स्वरूप भले ही बदला हो, केन्द्र में हिन्दी है और हिन्दी ही रहेगी। आज भले ही मिश्रित रूप में हैं, कल फिर हिन्दी हो जाएगी। माध्यम, लेखकों की सजकता और आस्था की जरुरत है।
सोमवार, 3 नवंबर 2008
राष्ट्रीय भाषा का विचार
"हरेक पढे-लिखे हिन्दुस्तानी को अपनी भाषा का, हिन्दू को संस्क्ऋत का, मुसलमान को अरबी का, पारसी को पर्शियन का और सबको हिन्दी का ज्ञान होना चाहिएकुछ हिन्दुओं को अरबी और कुछ मुसलमानों और पारसीयों को संस्क्ऋत सीखनी चाहिए। उत्तर और पश्चिम में रहने वाले हिन्दुस्तानी को तमिल सीखनी चाहिए। सारे हिन्दुस्तान के लिए तो हिन्दी ही होनी चाहिए। उसे उर्दू या नागरी लिपि में लिखने की छूट रहनी चाहिए। हिन्दू और मुसलमानों के विचारों को ठीक रखने के लिए बहुतेरे हिन्दुस्तानियों का दोनों लिपियां जानना जरुरी है। ऎसा होने पर हम अपने आपस के व्यवहार में से अंग्रेजी को निकाल बाहर कर सकेंगे।"
21-01-1920 के 'यंग इंडिया' में ' अपील टु मद्रास ' नाम के लेख में गांधीजी ने राष्ट्रभाषा की व्याख्या (पेज 16) की थी-
" मैं सोच - समझ कर इस नतिजे पर पहुंचा हूं कि राष्ट्र के कार - बार के लिए या विचार - विनिमय के लिए हिन्दुस्तानी को छोडकर दूसरी कोई भाषा शायद ही राष्ट्रीय माध्यम बन सके। (हिन्दुस्तानी यानी हिन्दी और उर्दू के मिलाप से पैदा होने वाली भाषा।) श्रोत - राष्ट्रभाषा हिन्दुस्तानी : गांधीजी अनुवादक - काशीनाथ त्रिवेदी
वैसे देखा जाए तो आज के सदी के लिए ये बातें बहुत अजीब हैं क्योंकि आज हिन्दी और अंग्रेजी को ही जनता ज्यादा तवज्जो देती है इसलिए कि भूमंडलीकरण के इस दौर में अंतरराष्ट्रीय संबंध के लिए अंग्रेजी को महत्व दिया जाता है यह जानते और कहते हुए कि हिन्दी विश्व की सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा में अंग्रेजी से उपर है।
गांधीजी के समय में राष्ट्रभाषा के लिए हिन्दी या हिन्दुस्तानी की बात की जाती थी इसपर एक चर्चा 12-10-1947 को हरिजनसेवक में प्रकाशित हुई थी -
सवाल - हमारी राष्ट्रभाषा क्या होगी ? हिन्दी या हिन्दुस्तानी ?
जवाब - अगर हम सांप्रदायिक दृ्ष्टिकोण छोड. दें और साईंस की नजर से इस सवाल पर विचार करें, तो हम खुद ही इस नतीजे पर पहुंचेंगे कि हिन्दुस्तानी को ही राष्ट्रभाषा बनाने में हमारा हित है। वह न तो संस्कृत शब्दों से लदी हिन्दी हो, न फा़रसी शब्दों से लदी उर्दू, बल्कि इन दोनों जबानों का सुन्दर मेल हो। उसमें अलग - अलग प्रान्तीय भाषाओं और विदेशी भाषा के शब्द भी ,उनके अर्थ, मिठास या संबंध की दृष्टि से आजा़दी के साथ शामिल किए जायें, बशर्ते कि वे हमारी राष्ट्रभाषा में पूरी तरह घुलमिल सकते हों। सिर्फ हिन्दी या उर्दू तक अपने को सीमित रखना समझदारी और राष्ट्रीयता के खिलाफ़ गुनाह करना होगा। अंग्रेजी भाषा दुनिया की सारी भाषाओं से सिर्फ इसलिए धनवान है कि उसने सभी भाषाओं से शब्द उधार लिए हैं। अगर अंग्रेजी में इटली, ग्रीस, जर्मनी वगैरह की भाषाओं के शब्द लिए जा सकते हैं , तो व्याकरण की दृष्टि से कोई फेरफार किए बगैर हम अपनी भाषा में अरबी - फा़रसी के शब्द लेने में क्यों हिचकिचायें ? साथ ही हमें दो लिपियां सीखने से क्यों घबराना चाहिए? (श्रोत - राष्ट्रभाषा हिन्दुस्तानी : गांधीजी अनुवादक - काशीनाथ त्रिवेदी नवजीवन मुद्रणालय, अहमदाबाद)
सोमवार, 15 सितंबर 2008
हिन्दी का हाल और हम
बहुत दिनों से मैंने अपने ब्लाग पर कोई विचार नहीं डाला इसका मुझे खेद है
दरअसल मै अपने एम.फिल. के शोध में व्यस्त थ बहुत जल्द अपने इस शोध की मुख्य बातों को भी ब्लाग पर प्रकाशित करूँगा
हिन्दी दिवस को लेकर पिछले कुछ सालों से जमकर बहसें हो रही हैं और खुब सरकारी पैसों का दुरुपयोग हो रहा है, हिन्दी को राजभाषा और राष्ट्रभाषा कहते हुए हिन्दी के प्रख्यात विद्वजनों द्वारा हिन्दी को आगे बढाने के लिये कितने कार्य हुए हैं इसकी समीक्षा कि जाये तो शायद 2-5 प्रतिशत विद्वान ही होंगे, जिन्होंने वाकई कुछ ठोस कार्य किया है
साहित्यिक पत्रिका हंस के संपादक राजेंद्र यादव ने भी कहा है -जैसे 15 अगस्त को झंडा फहरा लेते हैं, दो अक्टूबर को राजघाट जाकर फूल चढ़ाते हैं, उसी तरह का यह भी एक आयोजन है जहाँ हिन्दी की याद लोगों को सिर्फ़ हिन्दी दिवस या इस दौरान होने वाले कार्यक्रमों में ही आती है, बाकी 364 दिन लोग हिन्दी को भूले रहते हैं और इस बारे में बात भी नहीं करते हैं जिस तरह अब राष्ट्रीय पर्वों के आयोजनों में जनता की कोई शिरकत नहीं होती, बस नेता, मंत्री और स्कूलों से लाए गए बच्चे होते हैं, वैसे ही अब सरकारी हिन्दी दिवसों के आयोजनों में भी हो रहा है.लोग आपस में अपनी सार्थकता सिद्ध करने के लिए या ये बताने के लिए कि वो कितने महत्वपूर्ण हैं, इस तरह का आयोजन करते हैं. साल भर हिन्दी पर कोई काम हो या न हो, यह आयोजन ज़रूर हो जाता है.
आज की हिन्दी जो जीवंत हिन्दी है, वो आज से नहीं, सैकड़ों सालों से बाज़ार में बनी हुई है.
परिवारों में, लोगों में और समाज में हिन्दी का बाज़ार तमाम चुनौतियों के बावजूद हिन्दी को जीवित और जीवंत बनाए हुए है. जाने माने विद्वान सुधीश पचोरी भी हिन्दी के नये रूप का समर्थन करते हैं
मीडिया और फ़िल्मों का इसमें बड़ा योगदान है. भाषा में निरंतर परिवर्तन हो रहा है और होते रहना चाहिए. किसी भी भाषा को बनाए रखने के लिए यह ज़रूरी होता है.
इसी तरह की बहुत सारी बातों को आज के संदर्भ में देखा जाए तो हिन्दी के इस हाल के जिम्मेदार कहीं न कहीं हम भी हैं जो अपनी हिन्दी को भाव न देकर इंग्लिश या अन्य भाषा को महत्व देते हैं, क्योंकि हमे लगता है कि हम माडर्न तभी कहलायेंगे जब हम हिन्दी के साथ-साथ इंग्लिश का भी प्रयोग करें लेकिन क्या यह इतना जरूरी है कि बिना कारण भी हम इसका प्रयोग करते रहें ठीक है कि कुछ मायने में आज कि स्थिति वैसी नहीं है परंतु हम चाह भी नहीं रहें हैं यह भी कहीं न कहीं सत्य है हमें चाहिए कि हम अपनी हिन्दी को संस्कार के साथ आगे बढाने में अपना योगदान करें
बीबीसी की अचला शर्मा कहती हैं-"जिस गंगा-जमुनी हिंदी के संस्कार मेरी घुट्टी में हैं, जिस हिंदी से मेरे बड़े होने, मेरे पढ़-लिख कर किसी क़ाबिल बनने, मेरे सपनों, मेरी यादों का संबंध है – वह हिंदी कहाँ है? " हिन्दी के अस्तित्व को बचाने के इच्छुक लोगों का एक वर्ग कहता है कि अगर हिन्दी में अँगरेज़ी के मेल को सहज स्वीकार न किया गया तो हिन्दी मर जाएगी. दूसरा पक्ष कहता है कि यह हिन्दी पर बलात्कार है और इससे हिन्दी की मौत निश्चित है. मेरा विचार है कि हिन्दी को अगर ज़िन्दा रहना है तो इन दोनों तरह के हिमायतियों से सावधान रहना होगा.
विमलेशकान्ति वर्मा ने भी कहा है-हिन्दी किसी एक भाषा का नाम नहीं है हिन्दी भाषा समष्टि का नाम है हिन्दी एक बैनर है, जिसमें उत्तर में नेपाल की तराई से लेकर दक्षिण में रायपुर और खण्डवा, पुर्व में भागलपुर और मिथिला से लेकर, पश्चिम में बाडमेर,बीकानेर और जैसलमेर तक आते हैं यह एक बहुत बडा क्षेत्र है इतने बडे क्षेत्र में जो भाषा बोली जाएगी उसमें वैकल्पिक प्रयोग होंगे ही होंगे
सोमवार, 17 मार्च 2008
जनसंचार में हिन्दी
मनुष्य के जीवन में यह कला सबसे प्राचीन और मौलिक रुप में रही हैएक बच्चा पैदा होते ही अपने रोने कि आवाज के साथ अपने आगमन की सूचना दे देता है उसका रोना चिल्लाना उसके संचार के भावों की ही अभिव्यक्ति है इंसान में यह प्रव्ऋति आदिम काल से रही है
संचार एक मूलभूत वैयक्तिक एवं सामाजिक आवश्यकता तथा सार्वभौमिक मानवाधिकार हैइसके बिना जीवन अर्थहीन और उद्देश्यहीन हो जाता है संचार के बिना जीवन में संपुर्णता नहीं होती, इसके बिना किसी समुदाय या मानव गरिमा की स्थापना की कल्पना भी नहीं की जा सकती है समय के साथ जैसे-2 मनुष्य का विकास होता गया साथ ही संचार के माध्यम का रुप भी विकसित होता गया संचार की प्रक्रिया समाचार-पत्र, आकाशवाणी और दूरदर्शन के आविष्कार और प्रसार के साथ तेजी से फैलती गई संचार का विस्त्ऋत रुप जनसंचार के नाम से जाना जाता है जिसका मूल व्युत़पतिक अर्थ 'भावों तथा विचारों का सामूहिक आदान-प्रदान है'
जार्ज ए. मिलर ने कहा है " जनसंचार का अर्थ सूचना को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहूँचाना है"(जनसंचार माध़यमों में हिन्दीः चँद्र कुमार, दि. क्लासिकल पब्लि.)
भाषा जनसंचार द्वारा विचारों को संप्रेषित करने का सबसे मुख्य माध्यम है माध्यमों की भाषा अर्थात् प्रयोक्ता जिस भाषा का इस्तेमाल करता है, यदि उस भाषा को श़्रोता या पाठक सहजतापूर्वक समझकर मौखिक या लिखित संप्रेषण स्थापित करतें हैं तो वही भाषा सफल संप्रेषण माध्यम होती है भाषा के बिना जनसंचार का लक्ष्य पुरा नहीं हो सकता, चाहे माध्यम कुछ भी हो इसलिये जनसंचार के सभी माध्यमों के लिये हर युग में किसी न किसी भाषा का उपयोग अनिवार्यतः होता आया है भाषा ने जनसंचार के कार्य को सुगम बनाया है , आकर्षण प्रदान किया है और विस्तार भी दिया है यही कारण है कि हम जनसंचार के सर्वसुलभ साधन के रुप में भाषा का उपयोग करते हैं
हमारे देश की राजभाषा और सबसे बडी संपर्कभाषा हिन्दी है हिन्दी का क्षेत्र बहुत व्यापक है देश के लगभग 11 राज्यों/केन्द्रशासित प्रदेशों में मुख्य रुप से बोली जाने वाली भाषा हिन्दी है देश की जनसंख्या का लगभग 42 प्रतिशत भाग हिन्दी बोलने वालों का है, बाकि भाग में अनेक भाषाएँ हैं और वहाँ भी लोग टूटी-फूटी हिन्दी बोल ही लेते हैं और समझते भी हैं
जनसंचार माध्यमों में हिन्दी भाषा के प्रयोग होने के पिछे हिन्दी का व्यापक क्षेत्र ही है इसी व्यापक क्षेत्र को ध्यान में रखकर इन माध्यमों द्वारा हिन्दी का प्रयोग हो रहा है उदारीकरण, भूमंडलीकरण,व्यावसायीकरण के युग की शुरुआत के साथ ही उपभोक्तावाद का भी जन्म हुआ और उपभक्ताओं को लुभाने के लिये व्यापार को जनसंचार माध्यमों के साथ जोड दिया गया
सोमवार, 3 मार्च 2008
गुरुवार, 02 नवंबर, 2006 को 16:40 GMT तक के samachar
अंग्रेज़ी पर गर्व और हिंदी पर शर्म?
सलमा ज़ैदीसंपादक, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम
क्या नई पीढ़ी हिंदी का क ख ग भी पढ़ पाएगी?
विदेश में कोई भारतीय चेहरा नज़र आता है तो एक अपनेपन का अहसास होता है.
हालाँकि लंदन में यह महसूस होता ही नहीं कि आप भारत से बाहर हैं लेकिन अन्य यूरोपीय देशों में बसे भारतीय दोस्तों से जब बात होती है तो उनसे यही सुनने को मिलता है.
अकसर ट्रेन में आते-जाते सामने बैठे भारतीयों को देख कर दिल जितना ख़ुश होता है, उन्हें आपस में अंग्रेज़ी में बात करते देख कर उतनी ही निराशा भी होती है.
मैं यह नहीं कहती कि हर भारतीय की मातृभाषा हिंदी ही है और वे उसे फ़र्राटे से बोल लेते हैं लेकिन मैं बात कर रही हूँ उन हिंदी भाषियों की जिन्हें हिंदी बोलने में झिझक महसूस होती है.
ऐसा कई बार हुआ कि मैंने किसी उत्तर भारतीय से हिंदी में सवाल किया और जवाब अंग्रेज़ी में मिला.
सोचते किस भाषा में हैं?
बहुत से फ़िल्मी सितारे लंदन आते रहते हैं. उनमें से बहुत कम हैं जो सहजता से हिंदी बोल पाते हों.
जो भाषा आपको रोज़ी-रोटी मुहैया करा रही है उससे ऐसी विमुखता?
लेकिन बात विदेश की ही क्यों क्या भारत में ऐसा नहीं है?
राजधानी या शताब्दी एक्सप्रेस से सफ़र करते हुए जब मैंने हिंदी अख़बार की मांग की तो अटेंडेंट को जाकर मेरे लिए अख़बार लाना पड़ा.
आज़ादी के साठ साल बाद आज भी अंग्रेज़ी बोलना गर्व और हिंदी बोलना शर्म की बात क्यों है?
क्या आने वाली पीढ़ी हिंदी के समृद्ध साहित्य से परिचित भी हो पाएगी? हम अपने बच्चों को इस विराट विरासत से महरूम क्यों कर रहे हैं?
ye lekh bbchindi.com par prakasit hua tha
